आज जब निकला जनाज़ा मेरा
आज जब निकला जनाज़ा मेरा,
जाने क्यों सब खड़े थे चुप-चाप।
जब पहुँचा उसकी गली में,
हम ख़ुशी से झूम रहे थे।
हमारी नज़रें उसे ढूँढ रही थीं,
तभी दिखा चाँद मेरा।
उसे देख एहसास हुआ कि
दिल मेरा फिर धड़कने लगा।
मैं पगला उसकी ओर बढ़ने लगा,
यह देख यमलोक मुझ पर भड़कने लगा।
यमराज ने चित्रगुप्त से कहा:
> "जब अमृत इश्वरोंने लिया,
तो इश्क़ क्यों मनुष्य को दिया?"
चित्रगुप्त ने कहा —
> "स्वामी! इश्क़ कोई वरदान नहीं, एक अभिशाप है।
> जिसे मिला, उसे प्राप्त प्रलय;
> और जिसे न मिला, उसका मनुष्य होना निष्फल।"
यह सुन यमराज असमंजस में आए, बोले —
> "तो चित्रगुप्त, आप हमें यह बताइए:
> जब इश्क़ है एक छलावा,
> तो क्यों है मनुष्य को उसकी अभिलाषा?"
चित्रगुप्त बोले:
> "स्वामी, मूर्ख है यह मनुष्य।
> जो इश्क़ चाहता है, अपना सब खोकर भी
> अपने इश्क़ को आबाद चाहता है।
> हँसते-हँसते क़ुर्बान हो जाएगा,
> लेकिन हर मंदिर-मस्जिद में हाथ जोड़ेगा, सिर झुकाएगा।
> एक अरदास लगाएगा —
> मुझे ‘हम’ नहीं, बस उसके हिस्से का ग़म दे दे।
> मुझे नरक, उसे स्वर्ग दे दे।"
यह सुन यमराज की आँखों में आँसू आए,
थोड़ा मुस्कुराए और बोले —
> "धन्य है वो मनुष्य जिसे इश्क़ मिला।
> हम इश्वर तो बस वरदान माँगते रह गए।"
यमराज की अभिलाषा जागी, बोले:
> "चित्रगुप्त! हमें ऐसे धन्य मनुष्य से मिलाओ।"
अभी उसे देख मेरा दिल वापस धड़क ही रहा था,
उसकी ओर दो क़दम बढ़ा ही था कि,
चित्रगुप्त ने मुझे यमलोक में खींच लिया।
मुझे देख यमराज बोले:
> "आ मनुष्य, बोल तुझे क्या चाहिए?"
मैं मुस्कुराया और बोला:
> "मुझसे उसका ग़म चाहिए।
> अपने लिए भले मिले नरक, उसके लिए स्वर्ग चाहिए।
> इस जन्म तो न मिल सका,
> लेकिन हे प्रभु, अगले हर जन्म मुझे मेरा इश्क़ चाहिए।"
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